Thursday, August 25, 2016

कृष्ण

कृष्ण न होते तो न मैं धर्म से जुड़ पाता और न ही अध्यात्म से !!
कृष्ण, बुद्ध और जीसस इन तीनो का मेरे जीवन में परम स्थान है..
प्रणाम भगवन
विजय

Monday, August 17, 2015

अम्मा

......मैंने पहले बोलना सीखा ...अम्मा... !

फिर लिखना सीखा.... क ख ग a b c 1 2 3 ...
फिर शब्द बुने !
फिर भाव भरे !

.... मैं अब कविता गुनता हूँ  , कहानी गड़ता हूँ ..
जिन्हें दुनिया पढ़ती है ..खो जाती है .. रोती है ... मुस्कराती है ...हंसती है ..चिल्लाती है ...
.....मुझे इनाम ,सम्मान , पुरस्कार से अनुग्रहित करती है ...!

.....और मैं किसी अँधेरे कोने में बैठकर,
....खुदा के सजदे में झुककर ,
धीमे से बोलता हूँ ...अम्मा !!!

विजय

Saturday, July 25, 2015

क्षमापना

शुभ संध्या दोस्तों . 

बहुत दिन हुए . आपसे कोई बात नहीं कर पाया . जीवन बहुत कठिन है . जैसा हम सोचते है , वैसा कुछ हो नहीं पाता है और हर पल एक नए चैलेंज के साथ हमारे सामने खड़ा हो जाता है . और जीवन की इसी आपाधापी में हमसे कुछ गलतियां भी हो जाती है . और अक्सर क्रोध हमारी जिव्हा और हमारे मन मस्तिष्क पर सवार हो जाता है . और इसी कारण हम जाने अनजाने में ही दुसरो को दुःख पहुंचाते है . जिनमे से अक्सर बहुत सारे व्यक्ति अपने ही होते है . और ये भी होता है की उनके चले जाने के बाद [ जीवित और न रहने पर –दोनों ही अवस्था में ] हमें बहुत दुःख होता है. इसलिए आज मैं आपको एक छोटी सी देशना देता हूँ . 

आईये आज मैं आपसे कुछ कहता हूँ . आप ये कार्य करिए . मैंने एक पत्र तैयार किया है . इसे आप किसी भी तरह से अपने सारे दोस्तों / रिश्तेदारों और जानने वाले ,जिससे भी आप मिले हो ; सभी को एक बार भेज दे. चाहे लिख कर भेजे / ईमेल मे भेजे / लेकिन भेजे जरुर . 

देखिये फिर क्या होता है . एक ऐसा जादू जो की आपने सभी रिश्ते ठीक कर देंगा . 

सच्ची ! 
एक बार कोशिश करे ! 

आपका अपना 
विजय 

**********

मान्यवर/ मान्यवरा

क्षमापना सारी गलतियों व अपराधों को धोने का अमोघ उपाय है. मनुष्य की श्रेष्टथा इसी में है कि वह अपनी भूलो को स्वीकार करे. जो अपराध को स्वीकार नही करता वह अपराध से कभी मुक्त भी नही हो पाता . 

जीवन पथ इतना लंबा और अटपटा है कि उसे यदि क्षमापना से बार बार बुहारा न जाए तो वह कुडादान बन जायेगा. 
दुनिया में सारे धर्मग्रंथो और उपदेशों का सार है कि क्षमा को छोड़कर हम कितना भी चले कहीं भी नही पहुँच पाएंगे. 

याथार्थ तो यही है कि आत्म उत्कर्ष के किशी भी शिखर पर कोई कभी पहुँचेंगा तो वह क्षमा के साथ ही पहुँचेंगा . 

आईये , क्षमा द्वार से प्रवेश कर , मनो मालिन्य , राग,  द्वेष और अहंकार से मुक्त हो.

मेरे द्वारा किये गए किसी भी गलती के लिए मैं क्षमापार्थी हूँ  . कृपया मुझे ह्रदय से क्षमा करिए !

आपका अपना 
क्षमा प्राथी

Wednesday, June 17, 2015

ओशो के ११ स्वर्णिम सूत्र



ओशो की वाणी में से कुछ बहुमूल्य चुनना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल भी। उनकी वाणी के अथाह सागर में से कुछ भी कहीं से भी ले लें, हर वाक्य ग्रंथ की तरह है। शशिकांत ‘सदैव’ बता रहे हैं, उनके 11 स्वर्णिम सूत्र, जिनको अपनाकर आप भी अपने व्यावहारिक जीवन को सफल बना सकते हैं:

अभी और यहीं

मनुष्य या तो अपने बीते हुए पलों में खोया रहता है या फिर अपने भविष्य की चिंताओं में डूबा रहता है। दोनों सूरतों में वह दुखी रहता है। ओशो कहते हैं कि वास्तविक जीवन वर्तमान में है। उसका संबंध किसी बीते हुए या आने वाले कल से नहीं है। जो वर्तमान में जीता है वही हमेशा खुश रहता है।

भागो नहीं, जागो

हम हमेशा अपने दुखों और जिम्मेदारियों से भागते रहते हैं, उनसे बचने के बहाने खोजते रहते हैं। अपनी गलतियों और कमियों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते रहते हैं, लेकिन ऐसा करके भी हम खुश नहीं रह पाते। ओशो कहते हैं कि परिस्थितियों से भागना नहीं चाहिए।

मैं नहीं, साक्षी भाव

मनुष्य के दुख का एक कारण यह भी है कि वह किसी भी चीज को, फिर वह इंसान हो या परिस्थिति, ज्यों का त्यों नहीं स्वीकारता। वह उसमें अपनी सोच अवश्य जोड़ देता है, जिसके कारण वह उसका हिस्सा बनने से चूक जाता है और दुखी हो जाता है। ओशो कहते हैं कि जो हो रहा है, उसे होने देना चाहिए, कोई अवरोध नहीं बनना चाहिए।

दमन, नहीं सृजन

मनुष्य सदा तनाव में रहता है। कभी ईर्ष्या से तो कभी क्रोध से भरा ही रहता है। उसमें भटकने और आक्रामक होने की संभावना हमेशा छुपी रहती है। वह चाहकर भी आनंदित और सुखी नहीं रह पाता। ओशो कहते हैं कि मनुष्य एक ऊर्जा है। हम यदि उस ऊर्जा को दबाएंगे तो वह कहीं न कहीं किसी और विराट रूप में प्रकट होगी ही।

शिकायत नहीं, धन्यवाद

ऐसा कौन है, जिसका मन शिकायतों से नहीं भरा! घर हो या दफ्तर, भगवान हो या संबंध, हम हमेशा सबसे शिकायत ही करते हैं। हमारी नजर हमेशा इस बात पर होती है कि हमें हमारे अनुसार क्या नहीं मिला। ओशो कहते हैं कि हमारी नजर सदा उस पर होनी चाहिए जो हमको मिला है।

ध्यान एकमात्र समाधान

अपनी इच्छाओं के पूरा होने के लिए लोग हमेशा से प्रार्थना, पूजा व कर्मकांड आदि को प्राथमिकता देते रहे हैं। ध्यान तो लोगों के लिए एक नीरस या उदास कर देने वाला काम है, तभी तो लोग पूछते हैं कि ध्यान करने से होगा क्या? ओशो ने ध्यान को जीवन में सबसे जरूरी बताया,यहां तक कि ध्यान को जीवन का आधार भी माना।

दूसरे को नहीं, खुद को बदलें

देखा जाए तो परोक्ष रूप से मनुष्य के तमाम दुखों और तकलीफों का आधार यह सोच रही है कि मेरे दुख का कारण सामने वाला है। हम परिस्थितियों या किस्मत के साथ भी यही रवैया रखते हैं कि वह बदलें हम नहीं।

अतिक्रमण नहीं, संतुलन

अति हर चीज की बुरी होती है। यह बात जानते हुए भी मनुष्य हर चीज की अति सुख को पाने या बनाए रखने के लिए करता है। ओशो कहते हैं सुख की चाह ही दुख की जड़ है। सुख अपने साथ दुख भी लाता है। ओशो कहते हैं न पाने का सुख हो, न खोने का दुख, यही अवस्था संन्यास की अवस्था है।

धर्म नहीं, धार्मिकता

मनुष्य ने अपनी पहचान को धर्म की पहचान से व्यक्त कर रखा है। कोई हिंदू है, कोई मुसलमान, कोई सिख तो कोई ईसाई। धर्म के नाम पर आपसी भेदभाव ही बढ़े हैं। नतीजा यह है कि आज धर्म पहले है मनुष्य और उसकी मनुष्यता बाद में। वह कहते हैं, आनंद मनुष्य का स्वभाव है और आनंद की कोई जाति नहीं उसका कोई धर्म नहीं।

सहें नहीं, स्वीकारें

बचपन से ही हमें सहना सिखाया जाता है। सहने को एक अच्छा गुण कहा जाता है। बरसों से यही दोहराया जाता रहा है कि यदि हर कोई सहनशील हो जाए तो न केवल व्यक्तिगत तौर पर बल्कि वैश्विक तौर पर धरती पर शांति हो सकती है, लेकिन आज परिणाम सामने है। ओशो बोध के पक्ष में हैं।

जीवन ही है प्रभु

ओशो कहते हैं कि आदमी बहुत अजीब है, वह इंसान की बनाई चीजों को तो मानता व पूजता है लेकिन स्वयं को, ईश्वर की बनाई सृष्टि और उसमें मौजूद प्रकृति की तरफ कभी भी आंख उठाकर नहीं देखता। सच यह है कि परमात्मा को मानने का मतलब ही हर चीज के लिए ‘हां’, पूर्ण स्वीकार भाव और यह जन्म जीवन उसका जीता-जागता सबूत है।

Sunday, January 25, 2015

RAMAYANA AND its VARIANT VERSIONS




RAMAYANA AND its VARIANT VERSIONS


||| My paper |||

RAMAYANA AND its VARIANT VERSIONS

Author
VIJAY KUMAR SAPPATTI

Abstract of the paper :

Title of the paper : RAMAYANA AND its VARIANT VERSIONS

Objective :

I have selected this topic of Ramayana variants to understand the different versions of the great epic available in various regions and across the borders . I have taken both international and regional versions into account .

Methodology:

I have used various books available in print medium and at the same time I have used the Internet facility also to research the subject which is spread in various platforms

The findings :

There are definitely more than one or several hundred versions as we go through the history and available resources. In each version there is some difference in explanations or in text format.

Conclusion:

Despite the several versions available it is still one of the best epic available in world which captures the imagination of the readers.

Introduction :

Writing a paper on the variants of Ramayan is a difficult task. Reading so many versions available is a tedious task and with every version one reads, there is possibility that we change our perceptions about the great Epic. I have taken care and understood that with every version there is a story attached to it. There is a belief system behind the version. Be it local, regional, national or international. We see differences in the versions according to time period of that era!

But despite all the versions as they say “God is limitless and there is no limit to his stories.” This proverb comes true to its full sense. With every reading we come across a new story and new approach to the original Ramayana .

As we go through the details we understand the dynamics of each story. The reason for submissions of this paper is just to know the variations of Ramayan in each generation or different Eras.

Valmiki Ramayana- An introduction

The Ramayana is one of the great Hindu epics. It is ascribed to the Hindu sage Valmiki and forms an important part of the Hindu literature, considered to be itihāasa. The Ramayana is one of the two great epics of Hinduism, the other being the Mahabharata. It depicts the duties of relationships, portraying ideal characters like the ideal father, the ideal servant, the ideal brother, the ideal wife, and the ideal king. The name Ramayana is a tatpurusha compound of Ram and Ayana ("going, advancing"), translating to "Rama's Journey".

Ramayana tells the story of Rama (an avatar of the Hindu supreme-god Vishnu), whose wife Sita is abducted by Ravana, the king of Lanka .Thematically, the Ramayana explores human values and the concept of dharma. It also gives us some insights as how to live life. Ramayana also tells us the basics of morality of life. It also shows various dimensions of Life on a greater canvas.

The Ramayana was first written by Valmiki [ original name Ratnakar ] the robber-turned-sage. The story of Rama was narrated to him by Narada. Once he witnessed a bird being killed by a hunter and heard the heart-rending cry of the bird’s mate. He felt the pain and out of this pain he was inspired to write the Ramayana.

The epic was an important influence on Sanskrit poetry and Indian life and culture, particularly through its establishment of the shloka meter. Like its epic cousin the Mahabharata, the Ramayana is not just an ordinary story: it contains the teachings of ancient Hindu sages and presents them in narrative allegory with philosophical and the devotional elements interspersed. The characters Rama, Sita, Lakshmana, Bharata, Hanuman and Ravana are all fundamental to the cultural consciousness of India.

The epic is traditionally divided into several major kāndās (books), which deal chronologically with the major events in the life of Rama. The division into 7 kāndās is as follows:

Kanda / Book Title Contents / details

1. Bāla Kāṇḍa
(Book of childhood) The origins and childhood of Rama, born to king Dasharatha of Ayodhya and destined to fight demons. Sita's swayamvara and subsequent wedding to Rama
2. Ayodhya Kāṇḍa
(Book of ayodhya) The preparations for Rama's coronation in the city of Ayodhya, his exile into the forest, and the regency of Bharata.
3. Araṇya Kāṇḍa
(Book of the forest) The forest life of Rama with Sita and Lakshmana, his constant companion. The kidnapping of Sita by the demon king Ravana.
4. Kishkindha Kāṇḍa
(Book of the monkey kingdom) Rama meets Hanuman and helps destroy the monkey people's king, Vali, making Vali's younger brother, Sugriva, king of Kishkindha instead.
5. Sundara Kāṇḍa
(Book of beauty) Detailed accounts of Hanuman's adventures, including his meeting with Sita. Traditionally read first when reading the Ramayana, this book's name derives from the fond name given to Hanuman by his mother.
6. Yuddha Kāṇḍa
(Book of war, also known as Lanka Kanda)
The battle in Lanka between the monkey and the demon armies of Rama and Ravana, respectively. After Ravana is defeated, Sita undergoes the test of fire, completes exile with Rama, and they return to Ayodhya to reign over the ideal state.
7. Uttara Kāṇḍa
(Last book) Rumors of impurity lead to Sita's banishment, during which she gives birth to and raises Lava and Kusha. Rama and Sita reconcile. The twin boys later ascend the throne of Ayodhya, after which Rama departs from the world.

The Ramayana consists of 24,000 verses in seven books (kāṇḍas) and 500 cantos (sargas). Srimad Valmiki Ramayana is composed of verses called Sloka, in Sanskrit language, which is an ancient language from India and are written in a 32-syllable meter called anustubh. These verses are grouped into individual chapters called Sargas, wherein a specific event or intent is told. These chapters or sargas are grouped into books called Kaandas where Kaanda means the inter-node stem of sugar cane, or also a particular phase of the story or an event in the course of storytelling. In its extant form, Valmiki's Ramayana is an epic poem of some 50,000 lines. The text survives in several thousand partial and complete manuscripts, the oldest of which is a palm-leaf manuscript found in Nepal and dated to the 11th century CE. The text has several regional renderings, recensions, and subrecensions. Ramayana is composed of about 480,002 words, being a quarter of the length of the full text of the Mahabharata or about four times the length of the Iliad.

The Entire story of THE VALMIKI RAMAYANA is as detailed below:

Dasharatha was the king of Kosala, the capital of which was the city of Ayodhya. He had three queens: Kausalya, Kaikeyi and Sumithra. He was childless for a long time and, anxious to produce an heir, he performs a fire sacrifice known as Putra-Kameshti Yagna. As a consequence, Rama is first born to Kausalya, Bharata is born to Kaikeyi, and Sumitra gives birth to twins named Lakshmana and Shatrughna. These sons are endowed, to various degrees, with the essence of the God Vishnu; Vishnu had opted to be born into mortality in order to combat the demon Ravana, who was oppressing the Gods, and who could only be destroyed by a mortal. The boys are reared as the princes of the realm, receiving instructions from the scriptures and in warfare. When Rama is 16 years old, the sage Vishwamitra comes to the court of Dasharatha in search of help against demons, who were disturbing sacrificial rites. He chooses Rama, who is followed by Lakshmana, his constant companion throughout the story. Rama and Lakshmana receive instructions and supernatural weapons from Vishwamitra, and proceed to destroy the demons.

Janaka was the king of Mithila. One day, a female child was found in the field by the king in the deep furrow dug by this plough. Overwhelmed with joy, the king regarded the child as a "miraculous gift of God". The child was named Sita, the Sanskrit word for furrow. Sita grew up to be a girl of unparalleled beauty and charm. When Sita was of marriageable age, the king decided to have a swayamvara which included a contest. The king was in possession of an immensely heavy bow, presented to him by the God Shiva: whoever could wield the bow could marry Sita. The sage Vishwamitra attends the swayamvara with Rama and Lakshmana. Only Rama wields the bow and breaks it. Marriages are arranged between the sons of Dasharatha and daughters, nieces of Janaka. The weddings are celebrated with great festivity at Mithila and the marriage party returns to Ayodhya.

After Rama and Sita have been married for twelve years, Dasharatha who had grown old expresses his desire to crown Rama, to which the Kosala assembly and his subjects express their support. On the eve of the great event, Kaikeyi—her jealousy aroused by Manthara, a wicked maidservant—claims two boons that Dasharatha had long ago granted her. Kaikeyi demands Rama to be exiled into wilderness for fourteen years, while the succession passes to her son Bharata. The heartbroken king, constrained by his rigid devotion to his given word, accedes to Kaikeyi's demands. Rama accepts his father's reluctant decree with absolute submission and calm self-control which characterizes him throughout the story. He is joined by Sita and Lakshmana. When he asks Sita not to follow him, she says, "The forest where you dwell is Ayodhya for me and Ayodhya without you is a veritable hell for me." After Rama's departure, king Dasharatha, unable to bear the grief, passes away. Meanwhile, Bharata who was on a visit to his maternal uncle learns about the events in Ayodhya. Bharata refuses to profit from his mother's wicked scheming and visits Rama in the forest. He requests Rama to return and rule. But Rama, determined to carry out his father's orders to the letter, refuses to return before the period of exile. However, Bharata carries Rama's sandals, and keeps them on the throne, while he rules as Rama's regent.

Rama, Sita and Lakshmana journeyed southward along the banks of river Godavari, where they built cottages and lived off the land. At the Panchavati forest they are visited by a rakshasa woman, Surpanakha, the sister of Ravana. She attempts to seduce the brothers and, failing in this, attempts to kill Sita. Lakshmana stops her by cutting off her nose and ears. Hearing of this, her demon brother, Khara, organizes an attack against the princes. Rama annihilates Khara and his demons.

When news of these events reaches Ravana, he resolves to destroy Rama by capturing Sita with the aid of the rakshasa Maricha. Maricha, assuming the form of a golden deer, captivates Sita's attention. Entranced by the beauty of the deer, Sita pleads with Rama to capture it. Rama, aware that this is the play of the demons, is unable to dissuade Sita from her desire and chases the deer into the forest, leaving Sita under Lakshmana's guard. After some time Sita hears Rama calling out to her; afraid for his life she insists that Lakshmana rush to his aid. Lakshmana tries to assure her that Rama is invincible, and that it is best if he continues to follow Rama's orders to protect her. On the verge of hysterics Sita insists that it is not she but Rama who needs Lakshmana's help. He obeys her wish but stipulates that she is not to leave the cottage or entertain any strangers. Finally with the coast clear, Ravana appears in the guise of an ascetic requesting Sita's hospitality. Unaware of the devious plan of her guest, Sita is then forcibly carried away by the evil Ravana.

Jatayu, a vulture, tries to rescue Sita, but is mortally wounded. At Lanka, Sita is kept under the heavy guard of rakshasis. Ravana demands Sita marry him, but Sita, eternally devoted to Rama, refuses. Rama and Lakshmana learn about Sita's abduction from Jatayu, and immediately set out to save her. During their search, they meet the demon Kabana and the ascetic Shagbark, who direct them towards Sugriva and Hanuman.

The Kishkindha Kanda is set in the monkey citadel Kishkindha. Rama and Lakshmana meet Hanuman, the greatest of monkey heroes and an adherent of Sugriva, the banished pretender to the throne of Kishkindha. Rama befriends Sugriva and helps him by killing his elder brother Vali thus regaining the kingdom of Kishkindha, in exchange for helping Rama to recover Sita. However Sugriva soon forgets his promise and spends his time in debauchery. The clever monkey Queen, Tara, calmly intervenes to prevent an enraged Lakshmana from destroying the monkey citadel. She then eloquently convinces Sugriva to honor his pledge. Sugriva then sends search parties to the four corners of the earth, only to return without success from north, east and west. The southern search party under the leadership of Angad and Hanuman learns from a vulture named Sampati that Sita was taken to Lanka. Ravana is meeting Sita at Ashokavana. Hanuman is seen on the tree.

The Sundara Kanda forms the heart of Valmiki's Ramayana and consists of a detailed, vivid account of Hanuman's adventures. After learning about Sita, Hanuman assumes a gargantuan form and makes a colossal leap across the ocean to Lanka. Here, Hanuman explores the demon's city and spies on Ravana. He locates Sita in Ashoka grove, who is wooed and threatened by Ravana and his rakshasis to marry Ravana. He reassures her, giving Rama's signet ring as a sign of good faith. He offers to carry Sita back to Rama; however she refuses, reluctant to allow herself to be touched by a male other than her husband. She says that Rama himself must come and avenge the insult of her abduction.

Hanuman then wreaks havoc in Lanka by destroying trees and buildings, and killing Ravana's warriors. He allows himself to be captured and produced before Ravana. He gives a bold lecture to Ravana to release Sita. He is condemned and his tail is set on fire, but he escapes his bonds and, leaping from roof to roof, sets fire to Ravana's citadel and makes the giant leap back from the island. The joyous search party returns to Kishkindha with the news. The War of Lanka.It depicts monkey army of the protagonist Rama (top left, blue figure) fighting the demon-king of the king of Lanka, Ravana in order to save Rama's kidnapped wife Sita. The painting depicts multiple events in the battle against the three-headed demon general Trisiras, in bottom left - Trisiras is beheaded by the monkey-companion of Rama - Hanuman.

This book describes the battle between the forces of Rama and Ravana. Having received Hanuman's report on Sita, Rama and Lakshmana proceed with their allies towards the shore of the southern sea. There they are joined by Ravana's renegade brother Vibhishana. The monkeys named "Naal" and "Neel" constructs a floating bridge (known as Rama Setu) across the ocean, and the princes and their army cross over to Lanka. A lengthy battle ensues and Rama kills Ravana. Rama then installs Vibhishana on the throne of Lanka.

On meeting Sita, Rama asks her to undergo Agni Pariksha (test of fire) to prove her purity, since she had stayed at the demon's palace. When Sita plunges into the sacrificial fire, Agni the lord of fire raises Sita, unharmed, to the throne, attesting to her purity. The episode of Agni Pariksha varies in the versions of Ramayana by Valmiki and Tulsidas. The above version is from Valmiki Ramayana. In Tulsidas's Ramacharitamanas Sita was under the protection of Agni so it was necessary to bring her out before reuniting with Rama. At the expiration of his term of exile, Rama returns to Ayodhya with Sita and Lakshmana, where the coronation is performed. This is the beginning of Ram Rajya. Which means an ideal state with good morals. It is a place where all religions, creed and castes can live together in harmony and work towards progress together. Ram Rajya is the ultimate state of a true democracy where through unity one gains strength and protects the other as humanity is the greatest essence above all. Gambling, drinking and hunting were commonly condemned in Ram Rajya.

The Uttara Kanda concerns the final years of Rama, Sita, and Rama's brothers. After being crowned king, many years passed pleasantly with Sita. However, despite the Agni Pariksha (fire ordeal) of Sita, rumors about her purity are spreading among the populace of Ayodhya.Rama yields to public opinion and banishes Sita to the forest, where the sage Valmiki provides shelter in his ashram (hermitage). Here she gives birth to twin boys, Lava and Kusha, who became pupils of Valmiki and are brought up in ignorance of their identity.

Valmiki composes the Ramayana and teaches Lava and Kusha to sing it. Later, Rama holds a ceremony during Ashvamedha yagna, which the sage Valmiki, with Lava and Kusha, attends. Lava and Kusha sing the Ramayana in the presence of Rama and his vast audience. When Lava and Kusha recite about Sita's exile, Rama becomes grievous, and Valmiki produces Sita. Sita calls upon the Earth, her mother, to receive her and as the ground opens, she vanishes into it. Rama then learns that Lava and Kusha are his children. Later a messenger from the Gods appears and informs Rama that the mission of his incarnation was over. Rama returns to his celestial abode. The Uttara Kanda is regarded to be a later addition to the original story by Valmiki.

Ramayana – variant versions

"Both teller and listener shall be treasurers of wisdom for Rama's tale is mysterious." Indian saying.

And the great Tulsidas wrote:
हरी अनंत हरी कथा अनंता |
कहहि सुनहिं बहु बिधि सब संता ||
“God is limitless and there is no limit to his stories.”

Camille Bulcke, counted 300 telling’s of the epic. The number of versions of the epic which have existed in India and the rest of south-east Asia for the past 2,500 years or more is simply "astonishing".
Late poet and scholar AK Rumanian’s work - Three Hundred Ramayanas: Five Examples and Three Thoughts on Translation is another milestone in this study.
Though Valmiki's Sanskrit poem Ramayana is the most influential among Indians, Ram's story is available in at least 22 languages, including Chinese, Laotian, Thai and Tibetan. Many of these languages have more than one telling of the epic.
The study of such variants in India as well as in other countries like Thailand, Cambodia, Indonesia, China, Sri Lanka, Laos, Malaysia, Burma, Nepal, Philippines etc. There are texts of Ramayana in several regional languages, including Sanskrit, Chinese, Thai, Telugu, Bengali, Kashmiri, and Tamil.

I am presenting the variant versions in the following segments:

1. The Valmiki Ramayana translations / versions / adaptation
2. The Sanskrit /epic versions
3. The regional versions
4. The International versions

::: The valmiki Ramayana - translations & versions :::

1. The classic Griffith English translation
2. Muslim (Mappilla) Ramayana: Mappillapattu is a song genre popular among the Muslims in South India especially from Kerala and Lakshadweep. These Muslims incorporated episodes of Ramayana in these songs. These songs came to be known as Mappilla Ramayana and have been handed down from one generation to the next orally. In Mappilla Ramayana, the story of the Ramayana has been changed into that of a Sultan and there are no major changes in the names of characters except for that of Rama which is Laman in many places.
3. Jain Ramayana: in the Jain epic, Lakshmana kills Ravana. Rama is characterized an upright person who at the end sacrifices his kingdom, becomes a Jain monk and attains Moksha. Lakshmana kills Ravana and they both go to hell. According to the epic, one day they will be reborn as upright characters and will attain Moksha in their future births. Jains believe that Ravana will be reborn as Jain Tirthankara (the omniscient teacher).
4. Buddhist Version of Ramayana : In this version of Ramayana, Dasharatha was the king of Varanasi and not Ayodhya. Rama, Sita and Lakshmana were the siblings born to the first wife of Dasharatha. To protect his children from his second wife, the king sent the three in exile to the Himalayas. Twelve years later, the trio came back to the kingdom with Rama and Sita ruling as consorts. The abduction of Sita did not find a place in this version.
5. Sikh versionnIn of Ramayana : Guru Granth Sahib, there is description of two types of Ramayana. One is spiritual Ramayana which is actual subject of guru Granth sahib, in which ravan is ego, Seeta is budhi (intellect), ram is inner soul and lakshman is mann (attention, mind). The other Ramayana was written by Guru Gobind Singh,which is part of Dasam Granth
6. Champu Ramayana
7. Giridhara Ramayana,
8. Shree Ramayana mangeri,
9. Shree Ranganatha Ramayana,
10. Bhaskara Ramayana,
11. Radhey Shyam Ramayana.
12. Sitayah Caritam
13. Paulastya Vadham
14. Raghuvara Caritam
15. Raghuvamsa Caritam
16. Ramavrttam
17. Rama Caritam
18. Rama Katha.
19. The Gita Press version. it was published by the Nirnaya Sagara with Tilaka’s commentary in 1930
20. The Bangiya version
21. Italian Translation by Gorressio
22. The Eastern (Bangya) in 1908 in Bengali Characters by Pancanana Tarkaratna.
23. The Northwestern (Pascimaottariya), The Pascimottariya version was published in 1931
24. Ramayanam : Bhaaradwaaja Ramayanam and Hanumat Ramayanam : Contemporaries of Rama
25. Kamban 11th century CE
26. Ranganatha 12th to 15th century CE
27. Krttivas 14th century CE
28. Tulsidas’s Ramcharit Manas 1574 CE (Hindi)
29. Molla 1576 CE (Telugu)
30. Narahari 16th century CE
31. Balaramadas 16th century CE
32. Premanand 17th century CE
33. Sridhara 18th century CE
34. Ezhutthacchan century CE (Malayalam)
35. Ramakandam – Telugu Historical Novel 21st century CE
36. French edition of Ramayana
37. The earliest record of the Ramayana is a Chinese Buddhist text of disputed date.
38. Pre-Christian, Buddhist Dasaratha Jataka,
39. The sixteenth-century Bengali Ramayana Kriitibasa, by Chandravati,
40. The eighteenth-century Kashmiri Ramayana of Divakar Prakash Bhatt.
41. Anti-neo-nazi version of the Ramayana in London,
42. English version of Kamban — is by R. K. Narayan (Penguin Books)
43. Ramayana by C. Rajagopalachari (Bharatiya Vidya Bhavan).
44. Ramayana by William Buck.
45. The multi-volume version by Robert Goldman, Sheldon Pollock, and others.
46. AruNAchala Kavi's Rama nAtakam ,
47. Bhavabhuthi's MahAveera Charitham ( 700-740 AD ),
48. Swami Desikan's ( 1268-1369 AD ) Raghu Veera Gadhyam.
49. Father Kamil Bulke, author of Ramakatha

::: The Sanskrit / epic versions of ramayana :::

1. DURVAASA RAMAYANA : There is another Ramayana titled "DURVAASA RAMAYANA" written by the great sage Durvaasa Maharishi.
2. DEIVATHIN KURAL : by Mahaswamiji Sri Chandrasekarendra Saraswati
3. Mantra Ramayana: Nilakantha compiled a collection of mantras from the Rig Veda that correspond to the story of Rama. This collection is called the Mantra- Ramayana. The Mantra Ramayana itself has more than 150 Riks.
4. Adbhuta Ramayana: Adbhuta Ramayan is also said to be authored by sage Valmiki. This classic book can be broadly divided into two parts. The first (canto 1-16) elaborately describes the Ramayana upto killing of Ravana. The second part (canto 17-27) presents the story of Sri Ram's campaign against the thousand headed demon king Ravana of Pushakar who was the elder brother of the ten headed Ravana of Lanka, and much stronger and powerful than latter. In this war, Sita assumed the form of Makhakali, the dark-skinned Goddess worshipped as Shakti, to slay this Ravana and his demon force.The climax of the book and the aspect which makes it so unique and holy is when lord Ram prays to the cosmic Goddess or Shakti tuning 1008 divine names or mantras which describe and enumerate the various glories virtues and attributes of the magnificent Shakti of Mother Nature.
5. Adhyatma Ramayana: Adhyatma Ramayana represents the story of Rama in a spiritual context and in this version everything is preordained. It comprises around 4200 verses, is embedded in Brahmanda Purana and is considered to be authored by Ved Vyasa. Adhyatma Ramayana provides several valuable insights as follows; The provocation of the Queen Kaikeyi by her maid Manthara, was not an evil act of her choice as presented in the Valmiki's version Ramayana, but mastered by the goddess of knowledge, Saraswati, thus Manthara appears only to be playing her character in the larger drama of destiny, which lead to the killing of Ravana, the sole reason Lord Vishnu had incarnated as Rama. Similarly, according to this text, real Sita was never really abducted by Ravana. Rama being the all-knower in this version, has premonition about the abduction, and thus instructs Sita to invoke Agni, the God of Fire and creates an illusionary self, or Maya Sita, thus when Ravana finally appears, Sita plays along the character, and illusionary Sita is abducted, and is regained after the fire ordeal, once Ravana is killed. Adhyatma Ramayana raises every mundane activity of Rama, to a spiritual or transcendent level, Adhyatma Ramayana presents Ramayana as a divine allegory, where an exiled king, a man out of his elements, gets beguiled by the lure of maya or the illusions, - maya mrigya, hence loses his Beloved - Sita, to the demon or dark forces - Ravana. Later when he repents and asks for divine grace, he is given the strength and friends (Hanuman) to help him reclaim his divinity - (his Beloved).
6. Ananda Ramayana: Contents: 1. Sara-kanda. 2. Yatra-kanda. 3. Yaga-kanda. 4. Vilasa-kanda. 5. Janma-kanda. 6. Vivaha-kanda. 7. Rajya-kanda 8. Manohar-kanda. 9. Purna-kanda. In the Ananda Ramayana several events of later period have been included which could never appear to have been composed by Valmiki at all. There is a tradition that the Ananda Ramayana was composed by someone in the fourteenth century or so by a great poet, which appears to be acceptable by and large. One of the most interesting aspects of this Ramayana is the inclusion of the episode of abduction of Kausalya by Ravana which stands included in the first Sarga of the Sara-kanda. Further, this Ramayana portraits iconographical features of Rama and his brothers, describes about birth of Sita, Ravana carrying Parvati, skill of Hanuman etc. This Ramayana also has the unique coverage highlighting the Ramaraksa Stotras, a thousand names of Rama and the formation of several types of Ramabhadra and Ramalingatobhadras, besides Rama, Sita and the other kavacas.
7. Dingnaga (5th C.E.)
8. Bhavabhuti (8th C.E.)
9. Bhasa (5th C.E.) brings in significant changes to Valmiki Ramayana in his play called ‘Pratima Nataka’.
10. The 7th century CE "bhatti's poem" Bhaṭṭikāvya of Bhaṭṭi
11. Vasistha Ramayana
12. Agastya Ramayana is also traditionally attributed to Agastya.
13. An eleventh century Sanskrit play entitled Mahanataka by Hanumat relates the story of Rama in nine, ten, or fourteen acts, depending on recension.
14. Laghu Yoga Vasishtha, by Abhinanda of Kashmir,
15. the Mahabharata (in the Ramokhyana Parva of the Vana Parva)
16. Bhagavata Purana contains a concise account of Rama’s story in its ninth skandha;[8]
17. brief versions also appear in the Vishnu Purana as well as in the Agni Purana.
18. adbhutottara ramayanam
19. agastya ramayanam
20. agnivesa ramayanam
21. anargha raghava ramayanam
22. atri ramayanam
23. bal ramayana natakam
24. bharat ramayanam
25. bharadvaja ramayanam
26. bhatti kavyam
27. bhusundi ramayanam
28. bibhisana ramayanam
29. brahma ramayanam
30. campu ramayanam
31. deha ramayanam
32. dharma ramayanam
33. garuda ramayanam
34. gautam ramayanam
35. govinda ramayanam
36. hanumad ramayanam
37. hanumannatakam
38. jamadagni ramayanam
39. jaimini ramayanam
40. janaki harana ramayanam
41. jatayu ramayanam
42. kapil ramayanam
43. khetaketu ramayanam
44. kraunca ramayanam
45. krutivas ramayanam
46. lalit ramcaritam
47. lomasa ramayanam
48. mahabharat-van parvatantargat ramakatha
49. maha ramayanam
50. mahavir carit natakam
51. mahesvara ramayanam
52. mangal ramayanam
53. manu ramayanam
54. naividheya ramayanam
55. naradiya ramayanam
56. naradokta ramayanam
57. prasanna raghava natakam
58. pulastya ramayanam
59. raghuvamsa mahakavyam (by Kalidas)
60. ramacarit cintamani
61. ramasvamedham
62. ramatapaniyopanisad
63. ramesvara samhita
64. ramnam mahatmyam
65. ram raksastotram
66. ram samhita
67. saubhari ramayanam
68. siva ramayanam
69. skanda ramayanam
70. sugriva ramayanam
71. sumantra ramayanam
72. sunand ramayanam
73. surya ramayanam
74. sutiksna ramayanam
75. vasistha ramayanam
76. viranci ramayanam
77. visvamitra ramayanam
78. vrutta ramayanam
79. unmatta ramayanam
80. uttara ramacarit natakam
81. yajnavalkya ramayanam
82. yogavasistham
83. There are many other works also which are not yet collected fully.

::: The regional versions of Ramayana :::

1. Ramcharitmanas written by Tulsidas in the 16th century [ Awadhi and Hindi ]
2. In Urdu, it the Pothi Ramayana written in 17th century.
3. In Jammu and Kashmir, it is Kashmiri Ramavatara Charita written in 19th century.
4. In Punjab, it is the Ramavatara written in 17th century by Guru Gobind Singh.
5. In Gujarat, it is the Tulsi-krita Ramayana a Gujarati adaptation of Tulisdas Ramayana in 17th century by poet Premanand.
6. In Maharashtra, it is the Marathi Bhavartha Ramayana written by Eknath in the 16th century. There is also reference of Ramayana being translated into old Marathi during the 12th or 13th century.
7. In Assam, it is the Assamese Katha Ramayana or Kotha Ramayana in 15th century by Madhava Kandali. Saptakanda Ramayana is the 14th century Assamese version of the Ramayana attributed to the poet Madhava Kandali. It is considered to be the first translation from the Sanskrit to a modern regional Indo-Aryan language. This work is also considered one of the earliest written examples of the Assamese language.
8. In Bengal, it is the Bengali Krittivas Ramayan written by poet Krittivas in 15th century.
9. In Orissa, it is the Oriya Balramadasa Ramayana was adapted by Balarama Das in the 16th century.
10. In Andhra Pradesh, the Telugu Ramayan is known as Sri Ranganatha Ramayana and was adapted by Buddha Reddy.
11. In Karnataka, it is Kannada versions of the Ramayan – the Kumudendu Ramayana (Jain version) in 13th century and the Kumara-Valmiki Torave Ramayana in 16th century. There is another one titled Ramachandra Charita Purana written by Nagachandra during the 13th century.
12. In Tamil Nadu, it is the most popular Tamil Kamba Ramayana written by poet Kamban in the 12th century.
13. In Kerala, it is the Malayalam Adhyatma Ramayanam Kilipattu written by Thunchaththu Ezhuthachan in the 16th century.
14. An URDU version is called the "Pothi Ramayana" and was written in 17th century by Chak bast
15. Sri Ramayana Darshanam by Dr. K. V. Puttappa in Kannada
16. Ramayana Kalpavrikshamu by Viswanatha Satyanarayana in Telugu,
17. Geet Ramayanin Marathi by G.D. Madgulkar was rendered in music by Sudhir Phadke and is considered to be a masterpiece of Marathi literature.
18. Chanda Jha (1831–1907)-Mithilabhasha Ramayan
19. Lal Das (1856–1921) - Rameshwarcharit ramayan
20. Suryanayan Jha "sars's -ShreeSeetaRamcharitmanas
21. Seetayan- baidyanath Mallik 'Bidhu'
22. Seetawatarn mahakavya of Pradeep maithiliputra.

::: International translations/ versions :::

1. SRILANKA : In this version, Ravana is hero and He was known to be a complete manwhich is why he came to be known as “Dasamukha”. His kingdom was known to be the most advanced kingdom of his times. He freed a race from the oppression of the Devas. And yet Ravana’s death is the most celebrated death of the mankind.
2. Malaysia: Malaysian Ramayana According to this version of Ramayana, Dasaratha is a great grandson of Prophet Adam. Ravana receives boons from ALLAH and not Brahma. Lakshmana is the hero in this story and Rama is not at all heroic.
3. THAILAND : Thai Ramayana Thai version of Ramayana is known as Ramakien in the local language. In this version, Sita is the daughter of Ravana and Mandodari. Hanuman is the hero in this story and not Rama. In Malaysia, the Ramayana episodes are divided into two categories, those that concern the fundamental plot, pokok, (base,trunk) and those non-fundamental episodes, rantings (twigs), which consist of Rama's adventures and those of the other main characters
4. INDONESIA :The Ramayana epic came to Indonesia around the 8th or 9th century and was written in the Old Javanese language. It was entitled Ramayana Kakawin. It was used to revive Hinduism at the time when Buddhism was firmly entrenched in Sumatra, West and Central Java. The Hindu resurgence was made possible through the puppet shadow play, Wayang Kulit and the Wayang Purwa. There are also masked dance dramas, wooden doll puppet plays, and ballets depicting the Ramayana. A gamelan orchestra invariably accompanies these dramatic performances.
5. Hungerian version !
6. CAMBODIA :The Reamker is the Cambodian version of the Ramayana. There is evidence of the importance of Rama's story in Cambodian culture that dates to the 6th century AD. The earliest references to the Rama story are found in temple iconography and epigraphy. During the medieval centuries several versions of literary texts entitled Ramaker were written. Today we see evidence of the Ramakerti in oral tales, visual, and performing arts, especially classical dance of the Cambodian court.
7. LAOS :In northeastern Thailand there is a version of the Ramayana entitled Phra Lak Phra Lam which is the same story and title found in Laos. There are three versions of the Phra Lak Phra Lam and local legend has it that two of them were told by Buddha himself. It became a Jataka tale and is considered to be a story of one of the previous lives of Buddha. To the people Rama represents the ideals of righteousness and his life is depicted in dance, music, art, narrative, oral, and folkloric tradition throughout Laos. Two popular versions of the Ramayana are Phra Lak Phra Lam and Gvay Dvorahbi and are told for instructive and entertaining purposes.
8. Ramakavaca of Bali (Indonesia)
9. Maharadia Lawana and Darangen of Mindanao (Philippines),
10. The Yama Zatdaw ofMyanmar.
11. The 9th-century Javanese Kakawin Ramayana
12. Yogesvara Ramayana is attributed to the scribe Yogesvara circa 9th century CE, who was employed in the court of the Medang in Central Java
13. The Ravanavadham of Bhatti, popularly known as Bhattikavya.
14. Nepali ramyana - written by Bhanubhakta Acharya
15. written by Siddhidas Mahaju in Nepal Bhasa
16. Cambodia - Reamker
17. Thailand - Ramakien
18. Laos - Phra Lak Phra Lam
19. Burma (Myanmar) - Yama Zatdaw
20. Malaysia - Hikayat Seri Rama
21. Java, Indonesia - Kakawin Ramayana
22. Philippines - Maharadia Lawana
23. Nepal - The Nepal Bhasa version called Siddhi Ramayan was written by Mahakavi Siddhidas Mahaju Amatya during Nepal Bhasa renaissance era and the Khas language (later called "Nepali") version of Bhanubhaktako Ramayan by Bhanubhakta Acharya marked the first epic written in the language.
24. Tibet — found in several manuscripts from Dunhuang.

My Comments and observation

Despite all the versions as they say “God is limitless and there is no limit to his stories.” This proverb comes true to its full sense. With every reading we come across a new story and new approach to the original Ramayana .

Conclusion : Ramayana – The final word

As Tulsidas said :
हरी अनंत हरी कथा अनंता |
कहहि सुनहिं बहु बिधि सब संता ||
“God is limitless and there is no limit to his stories.”
There is no limit as how many versions of Ramayana are available in today’s world. I have tried to collect some of the known versions. I have taken help of many books and websites and material available on net and print media. And I am thankful to them all.

JAI SRI RAMA

Saturday, October 4, 2014

||| कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं |||


कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्त से शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा
इस संबंध में थोड़ी सी बात पीछे हुई है, लेकिन हमें समझ में नहीं आती है, इसलिए फिर दूसरी तरह से लौट आती है। मैंने प्रार्थना के संबंध में जो कहा, वह थोड़ा खयाल में लेंगे तो समझ में आ जाएगा। जैसा मैंने कहा कि प्रेयर नहीं, प्रेयरफुलनेस। ऐसा भक्ति का मतलब किसी की भक्ति नहीं होती, भक्ति का मतलब है, डिवोशनल एटिटयूड। भक्ति का मतलब है, भक्त का भाव। उसके लिए भगवान होना जरूरी नहीं है। भक्ति भगवान के बिना हो सकती है, ऐसा नहीं, भक्ति के कारण भगवान दिखाई पड़ना शुरू हुआ है। जिन लोगों का हृदय भक्ति से भरा है, उन्हें यह जगत भगवान हो जाता है। जिनका हृदय भक्ति से नहीं भरा है, वे पूछते हैं--भगवान कहां है? वे पूछेंगे। और उन्हें बताया नहीं जा सकता, क्योंकि वह भक्त के हृदय से देखा गया जगत है। वह भक्त के मार्ग से देखा गया जगत है।
जगत भगवान नहीं है, भक्तिपूर्ण ह्रदय जगत को भगवान की तरह देख पाता है। जगत पत्थर भी नहीं है, पत्थर की तरह हृदय जगत को पत्थर की तरह देख पाता है। जगत में जो हम देख रहे हैं, वह प्रोजेक्शन है, वह हमारे भीतर जो है उसका प्रतिफलन है। जगत में वही दिखाई पड़ता है, जो हम हैं। अगर भीतर भक्ति का भाव गहरा हुआ, तो जगत भगवान हो जाता है। फिर ऐसा नहीं है कि भगवान कहीं बैठा होता है किसी मंदिर में; फिर जो होता है वह भगवान ही होता है।
कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्त से शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा। एक दिन जब वह बाहर भगवान को देख लेगा, तो उसने खुद ऐसा क्या कसूर किया है कि उसे भीतर भगवान नहीं दिखाई पड़ेंगे! भक्त शुरू होता है भक्त की तरह, पूरा होता है भगवान की तरह। यात्रा शुरू करता है जगत को देखने की देखता है उसे जो जगत में है। भक्तिपूर्ण हृदय से, डिवोशनल माइंड से, प्रेयरफुल, भक्तिपूर्ण, भावपूर्ण, प्रार्थनापूर्ण मन से देखता है जगत को। फिर धीरे-धीरे अपने को भी उसी तरह देख पाता है, कोई उपाय नहीं रह जाता। फिर ऐसा भी हो जाता है, जैसा रामकृष्ण को एक बार हुआ। बहुत मजे की घटना है।
रामकृष्ण को एक मंदिर में पुरोहित की तरह रखा गया था, दक्षिणेशवर में। बहुत सस्ती नौकरी थी। शायद सोलह रूपये महीने की नौकरी थी। पुजारी की तरह रखा था उनको। लेकिन दस-पांच दिन में ही तकलीफ शुरू हो गई, क्योंकि ट्रस्टियों को खबर मिली कि यह आदमी तो ठीक नहीं मालूम होता। भगवान को जो भोग लगाता है, पहले खुद चख लेता है। और भगवान पर जो फूल चढ़ाता है, सूंघ लेता है। तो छिपकर ट्रस्टियों ने आकर देखा मंदिर में कि मामला क्या है? देखा कि बड़े भाव से रामकृष्ण नाचते हुए भीतर आए, भोग पहले खुद को लगाया, फिर भगवान को लगाया; फूल पहले सूंघे, फिर भगवान को सुंघाए। ट्रस्टियों ने उनको पकड़ लिया और कहा, यह क्या कर रहे हो? यह कोई ढंग है भक्ति का? रामकृष्ण ने कहा, भक्ति का ढंग होता है, यह कभी सुना नहीं। भक्त देखे हैं, भक्त सुने हैं, भक्ति का कोई ढंग होता है? कोई ढांचा, कोई डिसिप्लिन होती है? उन्होंने कहा, निकाल बाहर करेंगे! कहीं सूंघा हुआ फूल भगवान को चढ़ाया जा सकता है? रामकृष्ण ने कहा, बिना सूंघे चढ़ा कैसे सकता हूं? पता नहीं सुगंध हो भी या न हो! ट्रस्टियों ने कहा, बिना भगवान को प्रसाद लगाए तुम खुद कैसे खा लेते हो? रामकृष्ण ने कहा, मेरी मां मुझे खिलाती थी तो पहले चख लेती थी। मैं बिना चखे नहीं चढ़ा सकता। नौकरी तुम सम्हालो। अन्यथा मुझे यहां रखना है, तो मैं चखूगां, फिर चढ़ाऊंगा। पता नहीं खाने योग्य हो भी या न हो!
अब यह जो आदमी है, यह आदमी बाहर ही भगवान को कैसे देख पाएगा? बहुत जल्दी वह वक्त आ जाएगा, यह कहेगा कि भीतर भी भगवान है। तो भक्त से तो शुरु होती है यात्रा, भगवान पर पूरी होती है। ऐसा नहीं है कि बाहर कहीं किसी भगवान पर पूरी होती है, अंततः सारी दुनिया की यात्रा करके हम अपने पर लौट आते हैं और पाते हैं: जिसे हम खोजने गए थे वह घर में बैठा हुआ है।
कृष्ण दोनों हैं। तुम दोनों हो, सभी दोनों हैं। लेकिन भगवान से शुरू नहीं कर सकते हो तुम। भक्त से ही शुरु करना पड़ेगा। क्योंकि अगर तुमने यह कहा कि मैं भगवान हूं, तो खतरा है। ऐसे कई लोग खतरा पैदा करते हैं, जो भगवान की घोषणा तो कर देते हैं, तब ऐसे लोग अहंकेंद्रित होकर, इगोसेट्रिक होकर दूसरों को भक्त बनाने की कोशिश में लग जाते हैं। क्योंकि उनके भगवान के लिए भक्तों की जरूरत है। पर वे दूसरें में भगवान नहीं देख पाते। अपने में भगवान देखते हैं, दूसरे में भक्त देखते हैं। ऐसे गुरुडम के बहुत घेरे हैं सारी दुनिया में। यात्रा शुरु करनी पड़ेगी भक्ति से।
अब कृष्ण को भगवान माना जा सकता है, क्योंकि यह आदमी घोड़े तक की भक्ति कर सकता है। सांझ का जब घोड़े थक जाते हैं तो उन्हें ले जाता है नदी पर स्नान कराने। उनको नहलाता है, उनको खुरे से साफ करता है। यह आदमी भगवान होने की हैसियत रखता है। क्योंकि घोड़े को भी भगवान की तरह स्नान करवा सकता है। इस आदमी से डर नहीं है, इससे खतरा नहीं है। यह अगर भगवान की अकड़ वाला आदमी होता तो सारथी की जगह बैठ नहीं सकता। अर्जुन से कहता, बैठो नीचे, बैठने दो ऊपर! रहा मैं भगवान, तुम हो भक्त! भगवान बैठेंगे रथ में, भक्त चलाएगा।
जो अपने को भगवान घोषित करते हैं, जरा उन्हें तख्त के नीचे बिठाल कर आप तख्त पर बैठ कर देखिए, तब पता चलेगा!
भक्त से शुरु होगी यात्रा, भगवान पर पूरी होती है।
-ओशो

||| भक्ति की महिमा |||


भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनन्त |
ऊँच नीच घर अवतरै, होय सन्त का सन्त ||
की हुई भक्ति के बीज निष्फल नहीं होते चाहे अनंतो युग बीत जाये | भक्तिमान जीव सन्त का सन्त ही रहता है चाहे वह ऊँच - नीच माने गये किसी भी वर्ण - जाती में जन्म ले |
भक्ति पदारथ तब मिलै, तब गुरु होय सहाय |
प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय ||
भक्तिरूपी अमोलक वस्तु तब मिलती है जब यथार्थ सतगुरु मिलें और उनका उपदेश प्राप्त हो | जो प्रेम - प्रीति से पूर्ण भक्ति है, वह पुरुषार्थरुपी पूर्ण भाग्योदय से मिलती है |
भक्ति जो सीढ़ी मुक्ति की, चढ़ै भक्त हरषाय |
और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझो आय ||
भक्ति मुक्ति की सीडी है, इसलिए भक्तजन खुशी - खुशी उसपर चदते हैं | आकर अपने मन में समझो, दूसरा कोई इस भक्ति सीडी पर नहीं चढ़ सकता | (सत्य की खोज ही भक्ति है)
भक्ति बिन नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय |
शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय ||
कोई भक्ति को बिना मुक्ति नहीं पा सकता चाहे लाखो लाखो यत्न कर ले | जो गुरु के निर्णय वचनों का प्रेमी होता है, वही सत्संग द्वरा अपनी स्थिति को प्राप्त करता है |
भक्ति गेंद चौगान की, भावै कोइ लै लाय |
कहैं कबीर कुछ भेद नहिं, कहाँ रंक कहँ राय ||
भक्ति तो मैदान में गेंद के समान सार्वजनिक है, जिसे अच्छी लगे, ले जाये | गुरु कबीर जी कहते हैं कि, इसमें धनी - गरीब, ऊँच - नीच का भेदभाव नहीं है |
कबीर गुरु की भक्ति बिन, अधिक जीवन संसार |
धुँवा का सा धौरहरा, बिनसत लगै न बार ||
कबीर जी कहते हैं कि बिना गुरु भक्ति संसार में जीना धिक्कार है | यह माया तो धुएं के महल के समान है, इसके खतम होने में समय नहीं लगता |
जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय |
नाता तोड़े गुरु बजै, भक्त कहावै सोय ||
जब तक जाति - भांति का अभिमान है तब तक कोई भक्ति नहीं कर सकता | सब अहंकार को त्याग कर गुरु की सेवा करने से गुरु - भक्त कहला सकता है |
भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव |
भक्ति भाव एक रूप हैं, दोऊ एक सुभाव ||
भाव (प्रेम) बिना भक्ति नहीं होती, भक्ति बिना भाव (प्रेम) नहीं होते | भाव और भक्ति एक ही रूप के दो नाम हैं, क्योंकि दोनों का स्वभाव एक ही है |
जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चितलाय |
कहैं कबीर सतगुरु मिलै, आवागमन नशाय ||
जाति, कुल और वर्ण का अभिमान मिटाकर एवं मन लगाकर भक्ति करे | यथार्थ सतगुरु के मिलने पर आवागमन का दुःख अवश्य मिटेगा |
कामी क्रोधी लालची, इतने भक्ति न होय |
भक्ति करे कोई सुरमा, जाति बरन कुल खोय ||
कामी, क्रोधी और लालची लोगो से भक्ति नहीं हो सकती | जाति, वर्ण और कुल का मद मिटाकर, भक्ति तो कोई शूरवीर करता है |

Thursday, September 18, 2014

कृष्णं वन्दे जगतगुरु !!!


पिछले ३० सालो से एक बन्दे को समझने की कोशिश कर रहा हूँ .पर लगता है कि इस जन्म में उसे समझ नहीं पाऊंगा ! वो है कृष्ण !!!

कभी वो गोकुल का नटखट बालक है तो कभी वो महाभारत का निर्मम war moderator !
कभी वो राधा का निश्चल प्रेमी है तो कभी वो एक चालबाज राजनीतिक !
कभी वो मित्रो का मित्र है तो कभी वो दुश्मनों का दुश्मन !
कभी वो मानव है तो कभी भगवान !

वो अपने आप में एक रहस्यदर्शी है . उसे समझना असंभव है !!!

पर हाँ ,जब मैं उसका भक्त बनकर उसकी शरण में जाता हूँ तो सारे द्वार खुल जाते है और फिर कुछ भी समझने को बाकी नहीं रहता ! वो मेरे और मैं उनका !!!

कृष्णं वन्दे जगतगुरु !!!

कृष्ण का ये स्केच विजय बाबा ने बनाया है : एक भक्त की अपने प्रभु को भेंट !!





Wednesday, September 17, 2014

अन्नदान करिए !!!


दोस्तों , आधी दुनिया की चिंता ये है कि क्या खाए - क्योंकि उनके पास बहुत पैसा है और उनके पास खाने की choices  भी बहुत है . और ठीक उसी समय या फिर at any point of given time , बाकी की बची हुई आधी दुनिया की भी यही चिंता है कि क्या खाए - क्योंकि उनके पास खाने के लिए कम से कम खाना भी नहीं है , पैसे नहीं है ,इसलिए खाने की कोई choices भी नहीं है .
ये आदिकाल से चला आ रहा एक यक्ष प्रश्न है. आईये संकल्प करे कि जो कुछ भी हमसे हो सके - हम इस दुनिया में भूख को मिटाने में अपना योगदान करे. 

दोस्तों कम से कम एक मुट्ठी खाना भी अगर किसी को खिला सको तो समझो जी लिया . अन्नदान  करिए , इससे बेहतर ख़ुशी का रास्ता कोई और नहीं है !

आपका अपना 
विजय


Friday, September 5, 2014

शिक्षक दिवस

मेरे आत्मीय मित्रो 
नमस्कार 
आज शिक्षक दिवस है . हम सभी किसी न किसी गुरु को अपनाते है . उनकी शरण में जाते है. पर ये हमें कभी भी न भूलना चाहिए कि माता - पिता के बाद शिक्षक ही प्रथम गुरु है . आईये आज इस पावन दिन पर उन्हें ये बताये कि हमारी ज़िन्दगी में उनका कितना बड़ा योगदान है .
आप सभी को शिक्षक दिवस की ढेर सारी शुभकामनाये .
प्रणाम 
आपका अपना 
विजय



Tuesday, July 29, 2014

कभी हार न माने !!!

मेरे प्रिय आत्मन ; 
नमस्कार 

हम सब  जीवन के संघर्ष के गुजरते है और अक्सर ज़िन्दगी हमें टूट जाने की हद तक परेशान करती है .-इसकी आदत है कि हमें इतना परेशान करना कि हम हार मान जाए , पर जीतने का मौका भी हमें ज़िन्दगी ही देती है . 

रूमी का एक महत्वपूर्ण उपदेश है : 

"जब आप एक कठिन दौर से गुजरते हैं, जब सब कुछ आप का विरोध करने लगता है, जब आपको लगता है कि आप एक मिनट भी सहन नहीं कर सकते हैं, कभी हार न माने ! क्योंकि यही वह समय और स्थान है जब आपका अच्छा समय शुरू होगा I "

ज़िन्दगी ही हमें उठाती है , गिराती भी है और फिर से उठाती भी है , बस यारो थोडा सा जज्बा होना चाहिए , थोड़ी सी हिम्मत होनी चाहिए और एक विश्वास अपने आप पर और अपने प्रभु पर ! हमें जीतना ही होता है . 

आज मैं आपसे यही कहूँगा कि जीतना ही है आपको . हर संघर्ष से लड़ना ही होंगा 
और यही हम सबका परम धर्म होंगा ! 

मेरी एक कविता है : सपने 

सपने टूटते है ,
बिखरते है
चूर चूर होते है
और मैं उन्हें संभालता हूँ दिल के टुकडो की तरह
उठाकर रखता हूँ जैसे कोई टुटा हुआ खिलौना हो
सहेजता हूँ जैसे कांच की कोई मूरत टूटी हो .

और फिर शुरू होती है ,
एक अंतहीन यात्रा बाहर से भीतर की ओर
खुद को सँभालने की यात्रा ,
स्वंय को खत्म होने से रोकने की यात्रा
और शुरू होता है एक युद्ध
ज़िन्दगी से
भाग्य से
और स्वंय से ही
जिसमे जीत तो निश्चित होती है
बस
उसे पाना होता है

ताकि
मैं जी सकूँ
ताकि
मैं पा सकूँ
ताकि
मैं कह सकूँ
हां !
विजय तो मेरी ही हुई है.

तो आईये , हम हार न माने और उठकर खड़े हो फिर से जीने के लिए ! 

धन्यवाद और प्रणाम 
आपका अपना 
विजय 


Saturday, July 12, 2014

गुरु पूर्णिमा

मित्रो , 
आप सभी को मेरे प्रणाम . 

जीवन में गुरु का महत्व माता -पिता के सामान ही है . और एक ही जीवन में हम एक अथवा अनेक गुरुजनों से मिलते है और ज्ञान ग्रहण करते है . जीवन को एक सही दिशा देने में गुरु का ही सर्वोत्तम स्थान है . इस लिए तो कहा गया है कि : 

||| गुरु ब्रम्हा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वर, गुरु साक्षात् परब्रह्म, तैस्मय: श्री गुरुवे नमः |||

और ये भी बात उतनी ही सत्य है कि :

                    ईश कृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान ।
                    ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान ॥

आईये गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर हम अपने अपने गुरुजनों को याद करे और उन्हें अपने प्रणाम अर्पित करे. 

और हां , आप सभी तो मेरे गुरु है ही , मैं कुछ न कुछ आप सभी से सीखते रहता ही हूँ. इसलिए आप सभी को मेरे प्रणाम ! 

आपका जीवन शुभ हो . 
आपका अपना 
विजय 



Thursday, June 26, 2014

जीवन !!!

मेरे आत्मीय मित्रो , 
नमस्कार 

कभी इस पर भी सोचा है कि तुम्हारा खुद का क्या है जो इतना अभिमान है . 

जीवन से लेकर मरण तक सब कुछ तो दुसरे का ही है . तब क्यों जीवन को इस तरह जीना कि वो खुद के लिए भी कष्टदायक हो जाए और दुसरो के लिए भी तकलीफदेह ! 

आईये , ईश्वर को याद करके उन सभी का आभार माने  और धन्यवाद दे , जिन्होंने हमारे जीवन को संवारा , बेहतर बनाया ! 

ये जीवन आपका है . इसे खुशनुमा सिर्फ आप ही बना सकते है !

प्रणाम 
सदा ही आपका 
विजय 


Friday, June 20, 2014

जीवन में बोलने का महत्व ...!!!

मेरे प्रिय आत्मीय मित्रो , 
नमस्कार 

आपका जीवन शुभ हो इसी मंगलकामना के साथ मैं एक बात कहना चाहता हूँ . 

हमारे शरीर की एक मात्र सम्पूर्ण अभिव्यक्ति सिर्फ हमारी जीभ ही है . और प्रभु ने इसे लचीला बनाया है ताकि हम सुगमता से इसका उपयोग कर सके . 

लेकिन अक्सर ये होता है कि क्रोध की अधिकता और समय तथ अपने आसपास के मित्रो / व्यक्तियों के असर में हम अपने शरीर के सबसे महत्वपूर्ण  अंग का दुरूपयोग करते है और सिर्फ इसी की वज़ह से हमारे जीवन के संबंध बिगड़ जाते है .

आईये हम प्रण करे कि अपने जीवन को और सहज और प्रेमपूर्ण बनाए और अपनी बातो से किसी को दुःख न पहुंचाए क्योंकि किसी को भी दुःख पहुंचाने की कोशिश में सबसे पहले खुद को ही दुःख पहुँचता है . 

आपका जीवन शुभ हो !
प्रणाम 
आपका अपना 
विजय 


Saturday, May 17, 2014

धोखा देना

मेरे आत्मीय मित्रो , 
आईये हम कोशिश करे कि इस धोखेबाजी से बचे . 
धोखा देना , वो चाहे खुद को हो या दुसरो को . हमेशा ही दुःख देना वाला ही होता  है .
आपका जीवन आपका है , इसे सँवारे , बेहतर बनाए , खुश रहे और अपने आपको जीवंत बनाए रखे . 
यही मेरी मंगलकामना है . 
प्रणाम 
आपका 
विजय 



जीवन कैसे जिया जाए !


मेरे आत्मीय मित्रो , 

हम हमेशा से जीवन को कैसे जिया जाए इस बारे में पढ़ते -सुनते रहते है . कई बार हम अमल करते है और कई बार बस अनसुना कर देते है . 
मेरा मानना है कि जीवन को अगर अर्थपूर्ण ढंग से अगर जिया जाए तो जीवन को जीने का आनंद अधिक हो जाता है . 
आईये जीवन को बेहतर बनाए . 
प्रणाम 
आपका 
विजय 





Thursday, April 17, 2014

The Secret In Hindi Full Movie High Definition)

मेरे आत्मीय मित्रो ,
नमस्कार आपके लिए मैं सीक्रेट का हिंदी वर्शन यहाँ लगा रहा हूँ . जरुर देखे .
जीवन को देखने का नज़रिया बदलेंगा
आपका
विजय



Tuesday, April 15, 2014

ज़िन्दगी - एक नयी शुरुवात

मेरे आत्मीय मित्रो , 
नमस्कार 

जीवन की संभावनाए अनंत है . असीमित है . 
बस हमें जागना भर होता है और जानना भर ही होता है . 
सहज से ही जीवन बनता है . 
मेरी तो आप सभी से यही प्रार्थना है कि जीवन में खुश रहना सीखे . हम सभी के जीवन में दुःख होते है ,पर साथ ही परमात्मा हमें उन दुखो को जीने और उन दुखो से उभरने की शक्ति भी हमें प्रदान करते है. जीवन को जीना भी एक कला ही है . और मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि आप सभी को ये कला आती है. है न ! तो कुछ नए का सृजन करे . कुछ नया सोचे . जीवन को जिए पूरी सहजता और मुक्तता के साथ . जीवन की और आपकी सार्थकता तब ही है.

तो आईये एक नए जीवन का शुभारंभ करे . अपने जीवन को मुस्कराते हुए बेहतर बनाए ! 

प्रणाम 
ढेर सारी शुभकामनाये और खुशियों के आलिंगनो के साथ ! 
आपका अपना 
विजय 


Sunday, January 5, 2014

जीवन का रिश्ता

मेरे आत्मन,
नमस्कार .

हम सभी अपने जीवन को जीते हुए अक्सर एक छोटी सी बात को भूल जाते है और वो बात होती है जीवन का रिश्ता - जीवन में बने हुए रिश्तो से !

विवेकाननद के इस सूक्ति में गहरा रहस्य छुपा हुआ है !

आप सभी को एक बेहतर जीवन की ढेर सारी शुभकामनाये !
आपका अपना
विजय


Wednesday, November 27, 2013

मित्रता

मेरे प्रिय आत्मन .
नमस्कार ;

मित्रता ज़िन्दगी की सबसे अच्छी नेमत होती है .

अच्छी मित्रता कीजिये और जीवन भर इस मित्रता का साथ निभाये .

कहीं मैंने पढ़ा था " BE SLOW IN CHOOSING A FRIENDS AND SLOWER IN CHANGING " सो जीवन में सबसे गहरा रिश्ता मित्रता का ही है .

और आप सभी मेरे मित्र है .आपकी मित्रता को सलाम !

आपका
अपना
विजय


Wednesday, August 28, 2013

मनमोहना . कृष्णा कृष्णा

कृष्ण असीम है. उन्हें जानना इस जन्म में सिद्ध नहीं होंगा , हाँ अगर कृष्ण की चेतना से कुछ बूँद हमें अगर प्राप्त हो जाए तो फिर बात ही क्या ! जीवन ही धन्य हो जायेंगा .

Saturday, August 24, 2013

शिक्षा

प्रत्‍येक मनुष्‍य जिससे मैं मिलता हूं किसी न किसी रीत में / व्यवहार में / गुण में / ज़िन्दगी जीने के ढंग में / कला में / मुझसे श्रेष्‍ठ होता है इसलिए मैं उससे कुछ शिक्षा लेता हूं !

Wednesday, August 21, 2013

माँ

प्रिय मित्रो ;

माँ से बढकर कोई नहीं मित्रो . माँ ही ईश्वर का सच्चा स्वरुप है .
माँ है तो हम है .
माँ है तो जीवन है .
माँ है तो धरा है .
माँ है तो ईश्वर है. 


प्रणाम माँ 







विजय

Friday, August 2, 2013

क्षमा / माफ़ी

मेरे आत्मन ,
आप सभी को मेरे प्रणाम

माफ़ करना  इस संसार का सबसे श्रेष्ठ कार्य है . यदि आप किसी को क्षमा करते है तो इससे बड़ा व्यगतीगत दान , मेरी नज़र में कोई नहीं है .

माफ़ी देने से आप खुद को ही बेहतर करते/ पाते  है . दुसरो की दगाबाजी , धोखेबाजी , या किसी भी अन्य प्रकार  के छल, सिर्फ आपको मानसिक संताप देते है , जब तक कि आप उन सभी दुखो के लिए उस व्यक्ति को क्षमा नहीं कर देते.

आईये . एक स्वस्थ मन ,तन के लिए हम क्षमा का दान करे. उसकी राह पकडे.

धन्यवाद

ह्रदय से प्रेम भरे अलिंगनो के साथ आप सभी का .

विजय


Friday, July 26, 2013

गलतियां

मेरे प्रिय आत्मन ;

नमस्कार , जैसे की अमिताभ बच्चन ने एक बार कहा था कि दुसरो की गलतियों से सीखे. क्योंकि हम इतने दिन नहीं जिंदा रह सकते है की उतनी गलतियां कर सके. आज की देशना यही है कि दोस्तों; हम ये समझे कि इस छोटे से जीवन में सीखना बहुत जरुरी है . और सीखने के लिए गलतियां  बहुत जरुरी है . लेकिन हम अपने छोटे से जीवन में इतनी गलतियां तो नहीं कर सकते की उनसे सब कुछ सीख सके. हाँ , एक बात हो सकती है की हम दुसरो की गलतियों से सीखे तब ही हम अपने जीवन को संवार सकते है . और अपने जीवन को संवारना किसे अच्छा नहीं लगेंगा . गलतियां हम सभी करते है . लेकिन सीखते बहुत कम है. इसलिए सीखिए . जीवन में सीखना ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है.

प्रणाम

आपका
स्वामी प्रेम विजय

Tuesday, July 23, 2013

हनुमान चालीसा


हनुमान चालीसा



श्री गुरू चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि,
बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥1॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार,
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस बिकार ॥2॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,
जय कपीस तिहुं लोक उजागर ॥3॥
राम दूत अतुलित बल धामा,
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥4॥
महावीर बिक्रम बजरंगी,
कुमति निवार सुमति के संगी ॥5॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुँचित केसा ॥6॥
हाथ बज्र और ध्वजा बिराजे,
काँधे मूंज जनेऊ साजे ॥7॥
शंकर सुवन केसरी नंदन,
तेज प्रताप महा जगवंदन ॥8॥
विद्यावान गुनि अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर ॥9॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बसिया ॥10॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा,
विकट रूप धरि लंक जरावा ॥11॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे,
रामचंद्र के काज सवाँरे ॥12॥
लाय संजीवन लखन जियाए,
श्री रघुबीर हरषि उर लाए ॥13॥
रघुपति किन्ही बहुत बड़ाई,
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥14॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं,
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥15॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा,
नारद सारद सहित अहीसा ॥16॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,
कवि कोविद कहि सकें कहाँ ते ॥17॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं किन्हा,
राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥18॥
तुम्हरो मंत्र विभीषन माना,
लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥19॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू,
लील्यो ताहि मधुर फ़ल जानू ॥20॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं,
जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं ॥21॥
दुर्गम काज जगत के जेते,
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥22॥
राम दुआरे तुम रखवारे,
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे ॥23॥
सब सुख लहै तुम्हारी शरना,
तुम रक्षक काहु को डरना ॥24॥
आपन तेज सम्हारो आपै,
तीनों लोक हाँक तै कांपै ॥25॥
भूत पिशाच निकट नहि आवै,
महाबीर जब नाम सुनावै ॥26॥
नासै रोग हरे सब पीरा,
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥27॥
संकट तै हनुमान छुडावै,
मन करम वचन ध्यान जो लावै ॥28॥
सब पर राम तपस्वी राजा,
तिन के काज सकल तुम साजा ॥29॥
और मनोरथ जो कोई लावै,
सोइ अमित जीवन फ़ल पावै ॥30॥
चारों जुग परताप तुम्हारा,
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥31॥
साधु संत के तुम रखवारे,
असुर निकंदन राम दुलारे ॥32॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता,
अस वर दीन्ह जानकी माता ॥33॥
राम रसायन तुम्हरे पासा,
सदा रहो रघुपति के दासा ॥34॥
तुम्हरे भजन राम को पावै,
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥35॥
अंतकाल रघुवरपूर जाई,
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ॥36॥
और देवता चित्त ना धरई,
हनुमत सेइ सर्व सुख करई ॥37॥
संकट कटै मिटै सब पीरा,
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥38॥
जै जै जै हनुमान गुसाईँ,
कृपा करहु गुरु देव की नाईं ॥39॥
जो सत बार पाठ कर कोई,
छूटइ बंदि महा सुख होई ॥40॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा,
होय सिद्धि साखी गौरीसा,
तुलसीदास सदा हरि चेरा,
कीजै नाथ ह्रदय महं डेरा,

पवन तनय संकट हरण्, मंगल मूरति रूप ॥
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥

Sunday, June 9, 2013

.सोचो ; साथ क्या ले जाओंगे यारो

प्रिय दोस्तों ,
नमस्कार ...कल मैंने पुछा था ....सोचो ; साथ क्या ले जाओंगे यारो .....

उसका सीधा सा जवाब है ... हम कुछ भी साथ लेकर नहीं आये थे ... लेकिन हाँ, जाते समय , बहुत कुछ साथ जायेंगा , हमारा भलापन, हमारी अच्छाई , हमारा प्रेम , हमारी दया , हमारी क्षमा , जीवन के वो पल , जिनमे हमने इस दुनिया के लिए सोचा , और दुसरो के लिए निस्वार्थ भाव से कुछ किया .... बस यही है जो साथ जायेंगा , बहुत समय पहले , शायद एक साल पहले मैंने एक पोस्ट लगाई थी :::  when death comes there will be only two questions ....... first - did you love and second - did you give ...  बस यही सार है जीवन का ..... प्रणाम ...

सदा आपका 

विजय 

Tuesday, June 4, 2013

सत्य

प्रिय आत्मन , 
नमस्कार .
मैं कुछ देर पहले ओशो के पत्र पढ़ रहा था . जो की उन्होंने अपने सन्यासियों को लिखा था . एक पत्र था जो उन्होंने अपने मित्र और सन्यासी श्री कोठारी जी को लिखा था . 
उसमे उन्होंने कहा था " हम चाहना ही नहीं जानते , वरना सत्य कितना निकट है " ये वाक्य मेरे मन में समां गया . कितनी सच्ची बात है . हा सच में ही नहीं जानते की हमें क्या चाहिए . या हमारी वास्तव में चाहत क्या है . नहीं तो ज्ञान से हमारी दूरी कितनी है . बिलकुल भी नहीं . 
तो सत्य यही है की हम ये जान ले की हमें क्या पाना है , हमारी चाहत क्या है . इजी फिर उसके बाद सारी तलाश खत्म हो जायेंगी . सब कुछ हमारे सामने दर्पण के तरह होंगा . तो मित्रो , आईये उस सत्य की खोज करे. और अपने आपको उसमे डुबो ले. 
प्रणाम आपका ही विजय

Thursday, May 30, 2013

एक बोध कथा



जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय " हमें याद आती है । 
दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ... 
उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ... आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ .. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ... 
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया – 
इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो .... 
टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं , 
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और 
रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है .. 
अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ... 
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है ... बाकी सब तो रेत है .. 
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ... 
इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये । 

Sunday, May 5, 2013

कबीर ...!!



कस्तूरी कुँडली बसै, मृग ढूँढे बन माहिँ।
ऐसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखे नाहिँ॥

प्रेम ना बाड़ी उपजे, प्रेम ना हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचे, सीस देई लै जाय॥

माला फेरत जुग भया, मिटा ना मन का फेर।
कर का मन का छाड़ि के, मन का मनका फेर॥

माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया सरीर।
आसा तृष्णा ना मुई, यों कह गये कबीर॥

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
खलक चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद॥

वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारण, साधु धरा शरीर॥

साधु बड़े परमारथी, धन जो बरसै आय।
तपन बुझावे और की, अपनो पारस लाय॥

सोना, सज्जन, साधु जन, टुटी जुड़ै सौ बार।
दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एकै धकै दरार॥

जिहिं धरि साध न पूजिए, हरि की सेवा नाहिं।
ते घर मरघट सारखे, भूत बसै तिन माहिं॥

मूरख संग ना कीजिए, लोहा जल ना तिराइ।
कदली, सीप, भुजंग-मुख, एक बूंद तिहँ भाइ॥

तिनका कबहुँ ना निन्दिए, जो पायन तले होय।
कबहुँ उड़न आँखन परै, पीर घनेरी होय॥

बोली एक अमोल है, जो कोइ बोलै जानि।
हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि॥

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करे, आपहुँ सीतल होय॥

लघुता ते प्रभुता मिले, प्रभुता ते प्रभु दूरी।
चींटी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूरी॥

निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥

मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।
मुकताहल मुकता चुगै, अब उड़ि अनत ना जाहिं॥

शिक्षा ....!!


सत्य के दिशा में सबसे बड़ा अपराध तो तब हो जाता है , जब हम सत्य के संबंध में रूढ़ धारणाओं को बच्चो के ऊपर थोपने का आग्रह करते है ! यह अत्यंत घातक दुराग्रह है ! 

परमात्मा और आत्मा के संबंध में विश्वास या अविश्वास बच्चो पर थोपे जाते है ! गीता, कुरान, कृष्ण , महावीर उन पर थोपे जाते है ! इस भांति सत्य के संबंध में उनकी जिज्ञासा पैदा ही नही हो पाती है ! वे स्वयं के प्रश्नों को ही उपलब्ध नही हो पाते है , और तब स्वयं के समाधानों को खोज लेने का तो सवाल ही नही है ! 

बने-बनाये तैयार समाधानों को ही वे फिर जीवनभर दुहराते रहते है ! उनकी स्थिति तोतो के जैसी हो जाती है ! पुनरुक्ति चिंतन नही है ! पुनरुक्ति तो जड़ता है ! सत्य किसी और से नही पाया जा सकता है, उसे तो स्वयं ही खोजना और पाना होता है ! 

---- ओशो